वर्तमान में शिक्षा व्यवस्था की एक ज्वलंत समस्या, विद्यालय में बढ़ती है असुरक्षा: भरत गिरी गोसाई

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राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय कपकोट जनपद बागेश्वर के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभाग प्रभारी भरत गिरी गोसाई ने बागेश्वर जनपद में घटित प्रभारी प्रधानाचार्य के निर्मम हत्या पर शिक्षा व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए बताया कि उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज भटखोला (झिरौली) के प्रभारी प्रधानाचार्य श्री दयानंद टम्टा (उम्र 55) की 18 जुलाई 2026 को स्कूल जाते समय उन्हीं के स्कूल के वरिष्ठ सहायक (क्लर्क) श्री नवल किशोर सोराड़ी ने उन पर चाकू से जानलेवा हमला कर निर्मम हत्या ने पूरे उत्तराखण्ड को झकझोर दिया है। जांच में सामने आया है कि क्लर्क का पिछले चार महीने से वेतन रुका हुआ था, क्योंकि उसके खिलाफ विभागीय कार्यों में लापरवाही और अभद्र व्यवहार के आरोप थे। आरोपी इसी बात से नाराज था और विभागीय अधिकारियों को भी धमकी दे रहा था। यह घटना केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं मानी जा सकती, बल्कि यह उस व्यापक प्रशासनिक और कार्य-सांस्कृतिक संकट का संकेत है जो राज्य के अनेक विद्यालयों मे दिखाई दे रहा है। विद्यालय शिक्षा का मंदिर माना जाता है, जहाँ शिक्षक और प्रधानाचार्य समाज के भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि वही स्थान भय, तनाव और विवाद का केंद्र बनने लगे, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखण्ड के विभिन्न जिलों में शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के साथ अभद्र व्यवहार, धमकी, मारपीट अथवा प्रशासनिक विवादों की घटनाएँ सामने आती रही हैं। कहीं कर्मचारियों की लगातार अनुपस्थिति को लेकर विवाद हुए, कहीं विद्यालय प्रबंधन और शिक्षकों के बीच टकराव की स्थिति बनी, तो कहीं स्थानीय दबाव के कारण शिक्षण कार्य प्रभावित हुआ। कुछ मामलों में शिक्षकों ने सुरक्षा की माँग की, जबकि कुछ मामलों में विभागीय कार्रवाई के अभाव ने विवाद को और बढ़ाया। ये घटनाएँ भले अलग-अलग हों, परंतु इनसे एक समान संदेश मिलता है कि विद्यालयों में अनुशासन और प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है।

उत्तराखंड के शिक्षा व्यवस्था में मूल समस्याएं :-
1. स्थायी नेतृत्व की कमी है:- अनेक विद्यालय लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानाचार्यों के भरोसे चलते हैं। जब किसी संस्था का नेतृत्व अस्थायी हो, तो निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है
2. शिक्षा विभाग में अनुभवी अधिकारियों की कमी भी महसूस की जाती है।
3. यदि किसी कर्मचारी के विरुद्ध लगातार शिकायतें हों और समय पर निष्पक्ष जांच न हो, तो तनाव बढ़ना स्वाभाविक है।
4. इसके अतिरिक्त, विभागीय कार्रवाई में देरी, शिकायतों के निस्तारण की अस्पष्ट प्रक्रिया, तथा स्थानीय स्तर पर बढ़ते दबाव भी परिस्थितियों को जटिल बना देते हैं।
5. कई शिक्षक यह महसूस करते हैं कि उन्हें प्रशासनिक सहयोग समय पर नहीं मिलता।

समस्या के निराकरण हेतु सुझाव:-
1. प्रधानाचार्यों की नियमित एवं स्थायी नियुक्ति की जाए।
2. शिक्षा अधिकारियों में पर्याप्त संख्या में पदोन्नति से नियुक्त अधिकारी हों, जिन्हें विद्यालय प्रशासन का अनुभव हो।
3. सभी शिकायतों की समयबद्ध जांच अनिवार्य की जाए।
4. विद्यालयों में सुरक्षा प्रोटोकॉल विकसित किए जाएँ।
5. डिजिटल उपस्थिति प्रणाली और नियमित निरीक्षण लागू हों।
6. शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के विरुद्ध हिंसा या धमकी पर तत्काल कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

बागेश्वर की घटना एक दुखद चेतावनी है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक सुधार, जवाबदेही और सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ऐसे विवाद भविष्य में और गंभीर रूप ले सकते हैं। यह आवश्यक है कि सरकार, शिक्षा विभाग, शिक्षक संगठन और समाज मिलकर विद्यालयों को सुरक्षित कार्यस्थल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएँ। विद्यालय में कोई मरने नहीं जाता; वहाँ शिक्षक ज्ञान देने और बच्चों का भविष्य संवारने जाते हैं। इसलिए प्रत्येक शिक्षक और प्रधानाचार्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल विभागीय दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

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